क्यों न रोकें तुम्हें? जान जाती है जब उठ के जाते हो तुम तुमको अपनी क़सम जान-ए-जाँ बात इतनी मेरी मान लो आज जाने की वक़्त की क़ैद में ज़िंदगी है मगर चंद घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं इनको खोकर कहीं

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